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शिवपुरी से ऋषि गोस्वामी की रिपोर्ट।
समाचार
शिवपुरी: दुष्कर्म मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, क्या 'सेटलमेंट' के खेल में पिसा निर्दोष।
शिवपुरी। शहर के देहात थाना क्षेत्र में एक युवती के साथ हुई दरिंदगी की घटना ने जहां मानवता को शर्मसार किया, वहीं इस मामले की जांच के दौरान पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। आरोप है कि पुलिस ने असली अपराधियों पर कार्रवाई के बीच एक बेकसूर मेडिकल संचालक को मोहरा बनाकर अवैध वसूली की पटकथा लिख डाली।
वारदात का संक्षिप्त घटनाक्रम
बीते मंगलवार रात, अमन गार्डन में आयोजित एक विवाह समारोह से 20 वर्षीय युवती को उसके परिचित गौरव रावत ने बाहर बुलाया। गौरव अपने साथी शिवम रावत के साथ बाइक पर आया था और युवती को एक लॉज में ले गया, जहाँ उसके साथ दुष्कर्म किया गया। अत्यधिक रक्तस्राव (Bleeding) होने के कारण युवती की हालत बिगड़ गई, जिसे गंभीर अवस्था में मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है।
असली मोड़: निर्दोष मेडिकल संचालक और ₹10 हजार का 'डील'
घटना के बाद जो कहानी निकलकर सामने आई है, वह पुलिस विभाग की छवि पर गहरा दाग लगाती है। बताया जा रहा है कि आरोपी गौरव रावत ने कोतवाली क्षेत्र की अनाज मंडी के पास स्थित एक मेडिकल स्टोर से 'ब्लड बंद करने की टैबलेट' खरीदी थी।
तथ्य जो चौंकाते हैं:
आरोपियों ने युवती को टैबलेट खिलाई ही नहीं थी।
देहात थाना पुलिस ने मुख्य आरोपियों के साथ-साथ मेडिकल संचालक आकाश को भी हिरासत में ले लिया।
आकाश का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने दवा बेची थी, जो किसी भी मेडिकल स्टोर का सामान्य व्यवसाय है।
भ्रष्टाचार की 'गाड़ी' और ₹10 हजार का ब्रेक
सूत्रों के अनुसार, मेडिकल संचालक आकाश को पुराने थाने में रखा गया। आरोप है कि वहां मौजूद एक दीवान जी द्वारा उसे डरा-धमकाकर मामले को रफा-दफा करने के एवज में ₹1 लाख की भारी-भरकम मांग की गई।
जब दबाव बढ़ा और "सौदेबाजी" शुरू हुई, तो मामला धीरे-धीरे नीचे गिरता गया। अंततः, यह पूरा "न्याय का खेल" ₹10 हजार पर जाकर सिमट गया। ₹10 हजार लेते ही पुलिस ने मेडिकल संचालक को छोड़ दिया।
गंभीर सवाल: मेडिकल संचालक का क्या कसूर?
इस पूरे घटनाक्रम ने कई अनुत्तरित प्रश्न खड़े कर दिए हैं:
कानूनी आधार: क्या किसी आरोपी को दवा बेचना अपराध की श्रेणी में आता है? यदि नहीं, तो आकाश को हिरासत में क्यों लिया गया?
वसूली का खेल: अगर मेडिकल संचालक अपराधी था, तो उसे ₹10 हजार लेकर क्यों छोड़ा गया? और अगर वह निर्दोष था, तो उसे प्रताड़ित क्यों किया गया?
नैतिकता: क्या पुलिस का काम पीड़ित को न्याय दिलाना है या आपदा में 'अवसर' तलाश कर अपनी जेबें भरना?
