न्यूज चाचा का धमाका
जितेंद्र जैन जिला शिवपुरी
समाचार
श्रीमान , निर्णय आपका है, कलम आपकी है, व्यवस्था आपकी है पर समाज की नब्ज भी कभी-कभी सुन लीजिये।
जिला_शिक्षा_अधिकारी के नाम
महोदय,
साकेत पुरोहित को बिना सूचना निलंबित करने का साहसिक कार्य आपकी कलम से सम्पन्न हुआ
जिसके लिये आपका हार्दिक अभिनंदन। ऐसे शिक्षक पर ऐसी कार्यवाही तो बनती ही है।
शिक्षक अपने दायित्व के साथ साथ सामाजिक कार्यो हेतु अपने जीवन का होम कर दे, अपने वेतन का आधा भाग "नर सेवा" के लिये खर्च कर दे,
शिवपुरी ही नही बल्कि आस पास के जिलों, प्रदेशो में जरूरतमंदों को "खून"उपलब्ध कराकर सैकड़ों लोगो की जान बचाता हो,
खुद तीन दर्जन से अधिक बार रक्तदान -
जीवनदान कर चुका हो,
आधा सैकड़ा रक्तदान शिविरों का आयोजन कर चुका हो,
शिक्षक से विभाग की छवि तो धूमिल होगी ही न?
माननीय, आपके महकमे में साकेत नाम का यह "कन्यादान यज्ञ" के माध्यम से तमाम निर्धन कन्याओं के विवाहों में भागीदारी करता है,
जीवनदान यज्ञ" के माध्यम से तमाम जरूरतमंदों के भीख मांग-मांगकर इलाज, ऑपरेशन कराता है,
नशा मुक्ति यज्ञ" के माध्यम से युवाओं के व्यसन छुड़ाकर उन्हें सही मार्ग पर ले जाने का अनवरत प्रयास करता है,
श्रीमान, इस व्यक्ति ने तो अब तक विवाह तक न करके अपने नेत्रदान-अंगदान" करने का न केवल संकल्प कर डाला
अन्य लोगों को भी इसके लिये प्रेरित कर दूसरों से भी अंगदान करा रहा है
सर जी, आपने राजनीतिक दबाव में आकर अविलम्ब इसका निलंबन करके इसकी मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने का
यह पुण्य कार्य किया, जिसके लिये आपका नागरिक अभिनंदन ।
मास्टर ट्रेनर होने के कारण यह लोगों को हैप्पीनेस, तनावमुक्त रहने, खुश रहने, परिवार-समाज में प्रेमपूर्ण वातावरण का निर्माण करने जैसे “पागलपन भरे” काम में जुट गया
दो माह में ही दो दर्जन से अधिक कार्यशालाएं आयोजित कर बैठा, जिसमें सैकड़ों शासकीय कर्मचारी व आमजन जीवन के सार को समझकर तनावमुक्त हुए।
जीवन में आनंदित रहने” का पाठ पढ़ाना कोई सरकारी शिक्षक का कार्य है?
मास्टर का काम तो सिर्फ उपस्थिति रजिस्टर में हाजिरी भरना, बच्चों को पढ़ाना ओर मध्यान्ह भोजन खिलाना
आपको साधुवाद कि आपने समय रहते इस “खतरे” को पहचान लिया, अन्यथा यदि ऐसे ही लोग समाज में सक्रिय रहे तो न जाने कितने लोग प्रेरित हो जाते, कितने युवा सेवा के मार्ग पर चल पड़ते… कितने घरों में उम्मीद की रोशनी जल उठती,और फिर व्यवस्था की वह “सुविधाजनक निष्क्रियता” कैसे बच पाती..?
श्रीमान, सच्चाई तो यह है कि साकेत जैसे लोग व्यवस्था के लिये नहीं, समाज के लिये जीते हैं।और यही उनका सबसे बड़ा “अपराध” है।
वे फाइलों में दर्ज उपलब्धियों से आगे बढ़कर जमीन पर परिणाम दिखाते हैं…! वे आदेशों का इंतजार नहीं करते, बल्कि जरूरत को पहचानकर कार्य करते हैं…!वे वेतन को अधिकार नहीं, बल्कि समाज के प्रति दायित्व मानते हैं…,और शायद यही कारण है कि वे “सिस्टम” के दायरे में फिट नहीं बैठते।
श्रीमान,आपकी कार्यशैली को नमन करते हुए कहना चाहूँगा कि आपने जिस तत्परता से एक ऐसे शिक्षक को दंडित करने का उदाहरण प्रस्तुत किया,
वह वास्तव में प्रशासनिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगाआखिर ऐसे “अपराधों” को अनदेखा कैसे किया जा सकता है.?
यदि हर शिक्षक “साकेत” बन गया तो विद्यालयों की चारदीवारी से निकलकर समाज में जागरूकता फैलने लगेगी… ,फिर आंकड़ों का क्या होगा...?
फाइलों की मोटाई कैसे बढ़ेगी..? निरीक्षण के समय दिखाने को क्या बचेगा.?आकाओं की जी हुजूरी कौन करेगा.?
श्रीमान, यह वही व्यक्ति है जो बच्चों को किताबों से अधिक जीवन का पाठ पढ़ाने की भूल कर बैठा। जो यह समझाने लगा कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने का संकल्प है। अब भला ऐसी सोच विभागीय “मापदंडों” में कहाँ फिट बैठती है...?
महोदय, आपने दबाब के चलते नियमों का पालन किया यह आपका दायित्व था।पर क्या कभी यह विचार किया गया कि नियम किसके लिये बने हैं?व्यवस्था को चलाने के लिये… या समाज को बेहतर बनाने के लिये..?यदि नियम मानवता से बड़े हो जाएं, तो फिर वे नियम नहीं,बंधन बन जाते हैं।
श्रीमान, निर्णय आपका है, कलम आपकी है, व्यवस्था आपकी है पर समाज की नब्ज भी कभी-कभी सुन लीजिये।
क्योंकि इतिहास गवाह है जो लोग व्यवस्था की नजर में दोषी होते हैं, वही समाज की नजर में असली नायक बन जाते हैं।आपका आभार कि आपके एक निलंबन ने उसे सुर्खियों में ला दिया।अब देखना यह है कि
"साकेत पुरोहित" एक निलंबित शिक्षक बनकर रह जाएगा,या एक जीवित प्रेरणा बनकर और मजबूत होकर उभरेगा।परिणाम जो भी हो किन्तु इस विशेष उपकार हेतु आपका अभिनंदन
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