न्यूज़ चाचा का धमाका
जितेंद्र जैन जिला शिवपुरी
समाचारशिवपुरी में इंसानियत और कर्तव्य का संगम तिरंगा फहराने से पहले कलेक्टर ने बचाई आदिवासी प्रसूता की जान, पूरे जिले में हो रही है सराहना।
कहा जाता है कि प्रशासन का असली चेहरा फाइलों में नहीं, बल्कि संकट के समय में लिए गए फैसलों में दिखता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर शिवपुरी जिले ने ऐसा ही एक मानवीय चेहरा देखा, जिसने सरकारी व्यवस्था को लेकर आम लोगों की सोच को एक नई दिशा दी। यह चेहरा था शिवपुरी कलेक्टर अर्पित वर्मा का।
80वें स्वतंत्रता दिवस पर जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था, शिवपुरी में एक तरफ राष्ट्रीय कर्तव्य निभाने की तैयारी थी तो दूसरी तरफ एक आदिवासी परिवार के लिए जिंदगी और मौत का संघर्ष चल रहा था। ऐसी विकट घड़ी में कलेक्टर अर्पित वर्मा ने जिस तरह से मानवीय संवेदनशीलता और प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया, वह न केवल सराहनीय है, बल्कि पूरे प्रदेश के अधिकारियों के लिए एक मिसाल है। आज हर जुबान पर एक ही बात है - शानदार कलेक्टर सर, आपकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है।
जब कलेक्टर के सामने आई दोहरी जिम्मेदारी*
दरअसल, इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में ध्वजारोहण के लिए जिले के प्रभारी मंत्री को आना था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वे ऐन वक्त पर नहीं आ सके। ऐसे में प्रोटोकॉल के अनुसार जिला कलेक्टर अर्पित वर्मा को मुख्य समारोह में ध्वजारोहण की महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।
पुलिस लाइन ग्राउंड में मुख्य समारोह की तैयारियां अंतिम चरण में थीं। पूरा प्रशासनिक अमला अलर्ट पर था। कलेक्टर वर्मा भी समारोह के लिए तैयार हो रहे थे। वर्दी में सजे जवान, स्कूली बच्चों की टोलियां, और हाथ में तिरंगा लिए आम नागरिक मैदान में पहुंच चुके थे। यह उनके लिए एक राष्ट्रीय कर्तव्य था, देश के सम्मान का प्रतीक था।
लेकिन ठीक उसी समय, सुबह करीब 7:30 बजे कंट्रोल रूम से एक खबर आई, जिसने कलेक्टर के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच दीं। खबर शिवपुरी जनपद के दूरस्थ आदिवासी बाहुल्य गांव देवपुर से थी।
देवपुर से आई दिल दहला देने वाली खबर।
देवपुर गांव में एक 26 वर्षीय आदिवासी महिला प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। यह उसका जुड़वा बच्चों का प्रसव था। जानकारी के अनुसार महिला को देर रात से ही प्रसव पीड़ा शुरू हो गई थी। गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और जागरूकता की कमी के कारण परिजनों ने घर पर ही प्रसव कराने का प्रयास किया।
सुबह तक एक बच्चे का जन्म तो घर पर ही हो गया था, लेकिन दूसरा बच्चा गर्भ में फंस गया था। महिला का अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था और उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। परिजनों ने 108 एंबुलेंस को फोन लगाया था, लेकिन खराब रास्ते और लोकेशन स्पष्ट न होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पा रही थी। गांव के कोटवार ने किसी तरह यह सूचना तहसीलदार और फिर कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचाई।
यह खबर सुनते ही कलेक्टर अर्पित वर्मा का पूरा ध्यान समारोह से हटकर उस अनजान आदिवासी महिला की तरफ चला गया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि सूचना की गंभीरता इतनी ज्यादा थी कि वे अपने जूतों के फीते तक ठीक से बांधना भूल गए और तुरंत अपने मोबाइल पर एक्टिव हो गए।
उनके सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ कुछ ही मिनटों में उन्हें मंच पर पहुंचकर देश की आन-बान-शान तिरंगे को सलामी देनी थी, और दूसरी तरफ देवपुर में एक मां और उसके नवजात की जिंदगी दांव पर लगी थी।
जूतों के फीते खुले रह गए, पर सिस्टम को कर दिया एक्टिव*
कलेक्टर अर्पित वर्मा ने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्होंने तत्काल अपने निवास से ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए और फोन पर एक साथ कई अधिकारियों को निर्देश देना शुरू कर दिया।
सबसे पहले उन्होंने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. संजय ऋषीश्वर को फोन लगाया और पूरी स्थिति से अवगत कराते हुए देवपुर के लिए विशेष मेडिकल टीम रवाना करने को कहा। इसके बाद उन्होंने जिला पंचायत सीईओ, एसडीएम शिवपुरी और तहसीलदार को निर्देश दिए कि वे तत्काल राजस्व अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मदद से एंबुलेंस को सही लोकेशन तक पहुंचाएं।
इतना ही नहीं, कलेक्टर ने स्वयं जिला अस्पताल के सिविल सर्जन से बात कर गायनिक विभाग की टीम को ऑपरेशन थिएटर तैयार रखने के निर्देश दिए, क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि मामला सिजेरियन तक जा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट कहा था - "किसी भी हालत में मां और दोनों बच्चों की जान बचनी चाहिए। मुझे हर 10 मिनट में अपडेट चाहिए। एंबुलेंस नहीं पहुंची तो मुझे बताओ, मैं खुद व्यवस्था करूंगा।"
कलेक्टर की इस सक्रियता का असर यह हुआ कि पूरा स्वास्थ्य महकमा हरकत में आ गया। देवपुर के नजदीकी उप स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम और आशा कार्यकर्ता को पैदल ही महिला के घर भेजा गया ताकि प्राथमिक उपचार शुरू किया जा सके। वहीं दूसरी एंबुलेंस को दूसरे रास्ते से भेजा गया।
तिरंगा भी फहराया, और जिंदगी भी बचाई*
करीब 8:15 बजे तक कलेक्टर ने यह सुनिश्चित कर लिया था कि मेडिकल टीम देवपुर के लिए रवाना हो चुकी है और महिला तक मदद पहुंचने वाली है। इसके बाद ही वे स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में शामिल होने के लिए पुलिस लाइन पहुंचे।
वहां उन्होंने पूरे गरिमामय तरीके से राष्ट्रीय ध्वज फहराया, राष्ट्रगान हुआ और उन्होंने मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन किया। लेकिन भाषण के दौरान भी वे बीच-बीच में अपने स्टाफ से देवपुर की अपडेट ले रहे थे।
उधर, प्रशासन की मुस्तैदी रंग लाई। दोपहर करीब 11 बजे तक आशा कार्यकर्ता और मेडिकल टीम प्रसूता के घर पहुंच गई थी। उन्होंने महिला को स्टेबल कर तत्काल एंबुलेंस से जिला अस्पताल रेफर किया। जिला अस्पताल में पहले से तैयार डॉक्टरों की टीम ने तुरंत प्रसूता का ऑपरेशन कर गर्भ में फंसे दूसरे बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
ईश्वर की कृपा और कलेक्टर की तत्परता से मां और दोनों नवजात बच्चे पूरी तरह से स्वस्थ हैं। वर्तमान में महिला जिला अस्पताल के मातृ एवं शिशु वार्ड में भर्ती है, जहां कलेक्टर के निर्देश पर उसे विशेष निगरानी में रखा गया है।
जब यह खबर समारोह स्थल पर पहुंची कि मां और दोनों बच्चे सुरक्षित हैं, तो कलेक्टर के चेहरे पर जो सुकून था, वह देखते ही बनता था।
क्यों खास है यह घटना?*
यह घटना कई मायनों में खास है। पहला, यह दिखाती है कि स्वतंत्रता दिवस केवल झंडा फहराने और मिठाई बांटने का त्योहार नहीं है। आजादी का असली मतलब है आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक सरकार की पहुंच। कलेक्टर अर्पित वर्मा ने आजादी के असली मायने को चरितार्थ कर दिया।
दूसरा, अक्सर देखा जाता है कि बड़े आयोजनों के दौरान अधिकारी प्रोटोकॉल में इतने उलझे रहते हैं कि मानवीय संवेदनाएं पीछे छूट जाती हैं। लेकिन यहां उल्टा हुआ। राष्ट्रीय कर्तव्य के साथ-साथ मानवीय कर्तव्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
तीसरा, शिवपुरी जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। इस एक घटना ने आम आदिवासी समाज में प्रशासन के प्रति विश्वास को कई गुना बढ़ा दिया है। देवपुर गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने आज तक ऐसा कलेक्टर नहीं देखा जो समारोह छोड़कर एक आदिवासी महिला की चिंता करे।
सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपाल तक हो रही है तारीफ।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद से सोशल मीडिया पर कलेक्टर अर्पित वर्मा की जमकर तारीफ हो रही है। लोग लिख रहे हैं - "शानदार कलेक्टर सर, आपकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। शब्दों में तो धन्यवाद ही लिखा जा सकता है, इससे आगे और क्या लिखूं। निःशब्द हूं आपकी कार्यशैली को देखकर! शिवपुरी में ऐसा कलेक्टर कभी नहीं देखा!"
वाकई, कलेक्टर अर्पित वर्मा ने यह साबित कर दिया है कि एक अच्छा अधिकारी वह नहीं जो सिर्फ कुर्सी पर बैठकर आदेश दे, बल्कि वह है जो जमीन से जुड़ी हकीकत को समझे और समय पर निर्णय ले।
स्वतंत्रता दिवस के दिन उन्होंने तिरंगे को सलामी देकर देश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन तो किया ही, साथ ही एक मां और उसके दो मासूमों की जान बचाकर मानवता के प्रति अपने सबसे बड़े कर्तव्य को भी पूरा किया। यह कहानी शिवपुरी के इतिहास में लंबे समय तक याद रखी जाएगी, और आने वाले अधिकारियों को यह सिखाती रहेगी कि अफसरी रुतबे में नहीं, सेवा में है
