बाचनौर चौराहे पर बिना अनुमति लगी स्वामी ब्रह्मानंद की प्रतिमा पुलिस बोली, सीसीटीवी कैमरों से की जा रही है प्रतिमा लगाने वालों की पहचान ।

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जितेंद्र जैन जिला शिवपुरी 

समाचार 

बाचनौर चौराहे पर बिना अनुमति लगी स्वामी ब्रह्मानंद की प्रतिमा पुलिस बोली, सीसीटीवी कैमरों से की जा रही है प्रतिमा लगाने वालों की पहचान ।

फोटो-बाचनौर चौराहे पर स्थापित की गई स्वामी ब्रह्मानंद की प्रतिमा ।


पिछोर में सार्वजनिक जगह पर बिना अनुमति महापुरुषों की मूर्ति लगाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। 

शुक्रवार-शनिवार की दरम्यानी रात अज्ञात लागों ने बाचनौर चौराहे के पास नए अस्पताल मार्ग पर रातों-रात स्वतंत्रता सेनानी स्वामी ब्रह्मानंद लोधी की प्रतिमा स्थापित कर दी। 

शनिवार सुबह जब लोगों ने सड़क किनारे नई प्रतिमा देखी तो पूरे क्षेत्र में चर्चा शुरू हो गई। खास बात यह है कि न तो किसी संगठन ने इसकी जिम्मेदारी ली है और न ही किसी व्यक्ति ने सामने आकर कहा है कि प्रतिमा उसने लगाई है। सूचना मिलते ही पिछोर पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुंचा और मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि सीसीटीवी और स्थानीय लोगों से पूछताछ कर प्रतिमा लगाने वालों की पहचान की जा रही है।

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पिछोर-खनियाधाना-करैरा में बन रहा है खतरनाक ट्रेंड

यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों में ही पिछोर, खनियाधाना और करैरा में बिना अनुमति महापुरुषों की प्रतिमा लगाने के आधा दर्जन मामले सामने आ चुके हैं। हर बार रात के अंधेरे में मूर्ति लगा दी जाती है, सुबह समाज के लोग इकट्ठे होते हैं, फिर दूसरा पक्ष विरोध करता है और पुलिस-प्रशासन के लिए कानून व्यवस्था की नई चुनौती खड़ी हो जाती है। कई मामलों में तो पुलिस को बिना अनुमति प्रतिमा लगाने पर एफआईआर तक दर्ज करनी पड़ी थी। प्रशासन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान पर सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना प्रतिमा लगाना पूरी तरह अवैध है और ऐसा करने वालों पर वैधानिक कार्रवाई होगी, बावजूद इसके यह सिलसिला रुक नहीं रहा।

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कौन थे स्वामी ब्रह्मानंद लोधी, जिनकी लगी प्रतिमा?

जिन स्वामी ब्रह्मानंद लोधी की प्रतिमा लगाई गई है, वे कोई सामान्य संत नहीं थे। उनका जन्म 4 दिसंबर 1894 को हुआ था। वे स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, गो-रक्षा आंदोलन के प्रणेता और आजाद भारत के पहले भगवाधारी सांसद थे। उन्होंने बुंदेलखंड में शिक्षा के प्रसार के लिए कई स्कूल-कालेज खुलवाए, इसलिए उन्हें बुंदेलखंड का मालवीय भी कहा जाता है। 13 सितंबर 1984 को उनका निधन हो गया था।

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