उपचुनाव में डॉ नरोत्तम मिश्रा के बजाए बीजेपी द्वारा आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद शुक्रवार की शाम से दतिया में हल्ला मचा है। सड़कों पर चक्काजाम किया जा रहा है। महिलाएं सड़क पर लेट गई हैं। सड़कों पर मीलों लंबे ज़ाम लगे हैं। प्रशासन ने धारा 163 लगा दी है।

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जितेंद्र जैन जिला शिवपुरी 

समाचार 

किसने कटवाया दादा का टिकिट!


उपचुनाव में डॉ नरोत्तम मिश्रा के बजाए बीजेपी द्वारा आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद शुक्रवार की शाम से दतिया में हल्ला मचा है। सड़कों पर चक्काजाम किया जा रहा है। महिलाएं सड़क पर लेट गई हैं। सड़कों पर मीलों लंबे ज़ाम लगे हैं। प्रशासन ने धारा 163 लगा दी है।

रात भर चला प्रदर्शन सुबह साढ़े चार बजे उग्र हो गया। नरोत्तम मिश्रा के कथित समर्थकों द्वारा किए गए पथराव में कुछ वाहन क्षतिग्रस्त हो गए। एक डीएसपी सहित आठ पुलिसकर्मी घायल हो गए। पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे, हल्का बल प्रयोग किया जिसमें कई समर्थक भी घायल हुए हैं, कई हिरासत में हैं। प्रदर्शन जारी है आसपास के जिलों से भी समर्थक पहुंच रहे हैं।

दरअसल, दादा के समर्थक रुष्ट हैं। उनका कहना है कि बीजेपी नेतृत्व ने दादा के साथ धोखा किया और "दादा" को टिकिट नहीं दिया। इस बात पर अपना विरोध जताने के लिए बीजेपी के जिला अध्यक्ष रघुवीर शरण सहित सभी पार्षदों, ग्रामीण निकाय के प्रतिनिधियों, अनेक कार्यकर्ताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। 

नरोत्तम मिश्रा, किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। 1990 में पहली बार विधायक बनें। 1998 और 2003 में दूसरी ओर तीसरी बार विधायक रहे। इस तरह लगातार 6 बार विधायक (दतिया और डबरा से) रहे और 2005 से 2023 तक शिवराज सरकार में जनसंपर्क, विधि, और गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। 2023 में वो हार गए। 2026 में टिकिट नहीं मिला।

वो भाजपा के सबसे कद्दावर नेताओं में शामिल हैं। जब कमलनाथ सरकार की जड़ें खोदी जा रही थीं तब दादा ऑपरेशन लोटस में प्रमुख भूमिका में थे। कमलनाथ सरकार गिराकर बीजेपी की सरकार बनाने वाले तमाम किरदारों में "दादा" को हनुमान कहा गया। और 2026 के उपचुनाव में ऐसे हनुमान का ही टिकिट कट गया। कार्यकर्ता गुस्सा होंगे ही।

दादा का टिकिट क्यों कटा? इस सवाल के अपने अपने जबाव हैं। कोई कह रहा है कि दादा बड़े नेता हैं मोहन सरकार में तमाम बड़े नेता अनमने से हैं ऐसे में पार्टी के नेता एक और नया शक्ति केंद्र नहीं बनने देना चाहते। कोई कह रहा है कि दादा बड़ा चेहरा हैं वो गृहमंत्री रहे रहे हैं, वो सीएम या प्रदेश अध्यक्ष का चेहरा थे इसलिए उनका कैरियर खत्म करने के लिए उनके साथ राजनीति हो गई।

सबके अपने अपने जवाब हैं। अखबारी सूत्रों के मुताबिक एमपी बीजेपी नेतृत्व ने सीएम मोहन यादव की सहमति से डॉ नरोत्तम मिश्रा के सिंगल नाम का पैनल टिकिट की अनुशंसा की साथ दिल्ली भेजा था। दिल्ली में दतिया विधानसभा को लेकर आई तमाम सर्वे रिपोर्ट के आधार पर डॉ नरोत्तम मिश्रा की संभावित हार को देखते हुए उनके स्थान पर आशुतोष तिवारी को टिकिट दिया गया।

अब दादा के समर्थकों के तेवरों को देखते हुए लगता है कि असंतोष दबा दिया जाए तब भी आशुतोष तिवारी माइनस पंद्रह बीस हजार से वोट की गिनती शुरू करेंगे। उन्हें पोलिंग बूथ पर कार्यकर्ता ढूंढने में भी कठिनाई आएगी। क्योंकि दतिया में दादा का सिर्फ जलवा नहीं है बल्कि उनके समर्थकों का जलजला भी है। टिकिट मिलने कटने हारने से जलजला कम नहीं हुआ। जलजला कम करने का मतलब है इलाके में खासकर ब्राह्मण वोट बैंक में क्षति पहुंचाना।

ये जलजला ही टिकिट काट गया। हां, दादा के जलवे जलाल से बने कार्यकर्ता और समर्थकों के जलजले ने सर्वे रिपोर्ट बिगाड़ी। वरना कोई कारण नहीं था कि टिकिट कटता, तब तक तो बिल्कुल नहीं कटता जब तक अमित शाह पॉवर में हैं। तो दादा जैसे जनाधार वाले दबंग नेताओं के जलवे से बना कार्यकर्ताओं का जलजला ही उनके लिए घातक बन जाता है।

इसकी भी एक पृष्ठभूमि होती है। संघर्षशील इलाकों में जीतना बेहद कठिन होता है। खासतौर पर तब जब सत्ता प्रतिकूल हो। नरोत्तम मिश्रा की राजनैतिक शुरुआत उस जमाने में हुई थी जब कांग्रेस की तूती बोलती थी। चुनाव ईवीएम से नहीं होते थे, बल्कि बैलेट पेपर पर मुहर लगाई जाती थी। ग्रामीण इलाकों में बैलेट पर बुलेट भारी पड़ती थी। और तब कार्यकर्ता अपने नेता के लिए पोलिंग बूथ पर मरने की स्थिति तक लड़ता था।

ऐसे सभी नेताओं के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता उन नेताओं के निजी और भरोसेमंद व्यक्ति बन चुके होते हैं। इसकी भी वजह है कि पार्टी का होने के बाद भी पार्टी नहीं बल्कि वह नेता ही उनके सुख-दुख की चिंता भी करता है और मदद करता है। पार्टी नेताओं के भाषण, मार्गदर्शन, वर्ग, बैठक, प्रशिक्षण से कार्यकर्ता का पेट नहीं भरता। और किसी एक नेता की छाप लगने पर उस कार्यकर्ता को कोई दूसरा नेता झेलता भी नहीं है। 

2003 में जब बीजेपी की सरकार आई तो ऐसे सभी खास कार्यकर्ता प्रभाव में आए। रोजगार के अवसर तलाशने के लिए ठेके और अपनों की मदद के लिए ट्रांसफर, सरकारी निर्माण, सरपंची से लेकर अध्यक्षी तक और पार्टी के प्रत्येक पद तक उन्हीं का दखल बढ़ा। थाना, कचहरी तक उनका सिक्का जमा। दादा के मंत्रालय तक भी उनकी सीधी पकड़ बनी। ऐसा होना स्वाभाविक है। इसे कार्यकर्ता द्वारा किए गए जीवन भर के समर्पण का प्रतिफल भी कह सकते हैं। यही राजनैतिक लोकतंत्र है।

बस, जैसे कार्यकर्ताओं की मेहनत से चुनाव जीते जाते हैं, वैसे ही कार्यकर्ताओं द्वारा मचाई जाने वाली धूम, दबंगई, दादागिरी, रुतबा और जलजला भी अपना असर दिखाता है। यह जलजला आमजन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहा है ये तथ्य समय रहते न तो कार्यकर्ता को समझ में आता है और न नेता को। कार्यकर्ताओं और समर्थकों के सारे कर्मों का फल अंततः नेता को भोगना पड़ता है। (गुना में भी ऐसे कई उदाहरण हैं।)

बस ऐसी ही कुछ कहानी है दतिया की। डॉ नरोत्तम मिश्रा निःसंदेह बड़े और प्रभावी नेता हैं। किंतु जब वो उपचुनाव की तैयारी की सभाओं में जनता से माफी मांग रहे थे तब भी साफ था कि जनता में नाराजगी है इसीलिये तो माफी मांग रहे हैं। इस माहौल के बीच सभी सर्वे उनके खिलाफ थे। वर्तमान रणनीति में सर्वे में जीत की संभावना वाले व्यक्ति को बीजेपी नेतृत्व टिकिट भले न दे, लेकिन हार की संभावना वाले को टिकिट नहीं देगी ये तय हो चुका है।

सनातनी होना, समर्पित होना, बहुत पुराना होना, बड़ा नेता होना, जाति का सिरमौर होना, क्षत्रप होना जैसे अलंकार पार्टी संगठन में काम करने के लिए उदाहरण और आधार हो सकते हैं। किन्तु धरातल पर किए गए सर्वे में बड़ी हार की रिपोर्ट आएगी तो पार्टी नेतृत्व इन आधारों पर टिकिट नहीं देगा।

दादा को टिकिट न मिलना उन सभी नेताओं के लिए बड़ा संदेश है जिन्हें भविष्य में टिकिट चाहिए। उन्हें सतर्क हो जाना चाहिए। ऐसा न हो कि उनका जलवा और उनके निजी लोगों व कार्यकर्ताओं का जलजला सर्वे बिगाड़ दे। याद रखिए जनता किसी को जिताने के लिए वोट नहीं देती, बल्कि इस बात इसको किसी भी कीमत पर जीतने नहीं देना है, ये सोचकर वोट देती है। इति

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