देश के बाजारों में फल-सब्जियां अब कैमिकल लैब के चूहों जैसी हो गई हैं।

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 समाचार 

देश के बाजारों में फल-सब्जियां अब कैमिकल लैब के चूहों जैसी हो गई हैं। 

टमाटर चमकते लाल, केले पीले रंग की दीवारों जैसे, आम हफ्तों तक कटे नहीं कटते सब कुछ एथिलीन गैस, कैल्शियम कार्बाइड और कृत्रिम रंगों से पकाया हुआ बिक रहा है। 

किसान रातोंरात फल पका रहे हैं,

 व्यापारी जहर बेच रहे हैं, और उपभोक्ता बिल्कुल अनजाने में रोज थाली में धीमा विष घोल रहे हैं। 

कैंसर, किडनी फेल, हार्मोनल इम्बैलेंस जैसी बीमारियां युवाओं में फैल रही हैं, लेकिन FSSAI और कृषि विभाग आंखें मूंदे हुए हैं।

 यह लापरवाही क्यों, यह सवाल हर घर से उठ रहा है?

कारण साफ हैं – पैसा और भ्रष्टाचार।

 एक केला कार्बाइड से 48 घंटे में तैयार हो जाता है, जो 10 गुना मुनाफा देता है। 

टमाटर में रेड 40 कलर डालकर महीनों ताजा रखा जाता है।

 वैज्ञानिक रिपोर्ट्स चीख-चीखकर बता रही हैं कि 80% नमूनों में कैमिकल लिमिट से ज्यादा मिला, लेकिन सैंपलिंग तो नाममात्र की

बड़े व्यापारी बच जाते हैं, जुर्माना 5000 रुपये – हंसी की बात।

 छोटे किसान पर FIR, जबकि वे मजबूरी में ऐसा करते हैं।


 आयातित फल भी उतने ही जहरीले – चीन से आने वाले सेब पर वैक्स की परत। 

बच्चे, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग सबसे ज्यादा शिकार। 

लीवर कैंसर के केस 30% बढ़े हैं, और लिंक सीधा कैमिकल्स से।

सरकार क्यों चुप?

 ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने के बजाय कैमिकल सब्सिडी पर खर्च। 

लैब्स में टेस्टिंग मशीनें खड़ी हैं, लेकिन स्टाफ सो रहा। 

उपभोक्ता आयोग चिल्लाते हैं,

 लेकिन कोई कार्रवाई नहीं।

 लोग खुद को बचा रहे – बाजार जाकर गंध सूंघते हैं,

 पकने का समय चेक करते हैं। 

असली फल में कीड़े लगते हैं, चमक नहीं होती। 

लेकिन जागरूकता कम है। 

समाधान? हर बाजार में मोबाइल टेस्टिंग वैन, भारी जुर्माना (करोड़ों का), किसानों को जैविक खाद सस्ते में। 

स्कूलों में सिखाएं – चमकदार मत खरीदो।

 NGO और सेलेब्स कैंपेन चलाएं।

विभागों को जगाओ!

 अगर अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ी जहर की भेंट चढ़ जाएगी। 

थाली बचाओ, देश बचाओ।

 यह समय कार्रवाई का है, चुप्पी का नहीं। 

लोग बीमार हो रहे हैं – संज्ञान लो!

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