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जितेंद्र जैन जिला शिवपुरी
समाचार
नरवर में शासकीय जमीन पर मूंगफली मिलों का खेल? प्रशासन मौन क्यों, कार्रवाई कब होगी!
गरीबों को प्रधानमंत्री आवास के लिए संघर्ष, रसूखदारों पर करोड़ों की सरकारी जमीन पर कारोबार के आरोप।
नरवर। नगर परिषद नरवर क्षेत्र में शासकीय भूमि के कथित अतिक्रमण और उस पर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित किए जाने का मामला अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि नगर परिषद क्षेत्र में कुछ स्थानों पर सरकारी भूमि पर कब्जा कर मूंगफली मिलों का संचालन किया जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि संबंधित भूमि वास्तव में शासकीय है और व्यावसायिक गतिविधि के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई है, तो लंबे समय से कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नियम-कायदे आम नागरिकों के लिए अलग और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन यदि सरकारी रिकॉर्ड में भूमि शासकीय दर्ज है और उस पर बिना वैधानिक अनुमति निर्माण अथवा व्यापार हो रहा है, तो यह प्रशासन के लिए गंभीर जांच का विषय है।
नगर परिषद अध्यक्ष के परिवार पर भी सवाल
मामले को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि आरोप नगर परिषद अध्यक्ष के पद से जुड़े परिवार पर भी लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि शासकीय भूमि पर कब्जे के बाद वहां मूंगफली मिल का संचालन किया जा रहा है और इसके लिए आवश्यक अनुमति तथा वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
यह आरोप कितना सही है, इसका फैसला राजस्व रिकॉर्ड, स्थल निरीक्षण, नगर परिषद के दस्तावेज, भवन अनुमति, उद्योग संबंधी अनुमति तथा अन्य संबंधित रिकॉर्ड की जांच से ही हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि संबंधित विभागों ने अब तक इन बिंदुओं की जांच क्यों नहीं की?
यदि भूमि शासकीय निकलती है तो यह भी जांच का विषय होगा कि उस भूमि पर कब्जा कब हुआ, निर्माण कब किया गया, किसकी अनुमति से व्यावसायिक गतिविधि शुरू हुई और संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की।
गरीब आवास के लिए परेशान, सरकारी जमीन पर कारोबार के आरोप
एक तरफ गरीब परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ पाने के लिए वर्षों तक दस्तावेज और स्वीकृति की प्रक्रिया में भटकते हैं। दूसरी तरफ यदि करोड़ों रुपये मूल्य की शासकीय भूमि पर प्रभावशाली लोगों द्वारा कथित रूप से कब्जा कर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, तो यह व्यवस्था की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
आम नागरिक का सवाल है—क्या सरकारी जमीन पर अधिकार केवल इसलिए मजबूत हो जाता है क्योंकि कब्जा करने वाला व्यक्ति आर्थिक या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है?
प्रशासन को इस सवाल का जवाब कार्रवाई और पारदर्शी जांच के माध्यम से देना चाहिए।
विधायक के पत्रों के बाद भी कार्रवाई पर सवाल
मामले में करैरा विधानसभा क्षेत्र के विधायक द्वारा जिला प्रशासन और राजस्व अधिकारियों को पत्र देकर शासकीय भूमि पर कथित अतिक्रमण की जानकारी दिए जाने की बात सामने आई है। यदि जनप्रतिनिधि द्वारा बार-बार शिकायत अथवा पत्राचार किया गया है तो संबंधित अधिकारियों को मौके का निरीक्षण कर रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि शिकायत मिलने के बाद क्या सीमांकन कराया गया? क्या मौके की वीडियोग्राफी हुई? क्या राजस्व रिकॉर्ड और वास्तविक कब्जे का मिलान किया गया? क्या नगर परिषद से भवन एवं व्यापार संबंधी अनुमति की जानकारी मांगी गई? यदि कार्रवाई हुई तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
मिलों से निकलने वाली गंदगी और स्वास्थ्य संबंधी चिंता
स्थानीय लोगों ने मिलों से निकलने वाली धूल, भूसे और अन्य अपशिष्ट सामग्री को लेकर भी चिंता जताई है। आरोप है कि आसपास के मकानों और छतों पर कई इंच तक भूसा अथवा कचरा जमा हो जाता है। इससे धूल और वायु प्रदूषण की समस्या पैदा होने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
यदि यह स्थिति वास्तविक है तो स्वास्थ्य विभाग, नगर परिषद और प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित अधिकारियों को मौके पर जाकर निरीक्षण करना चाहिए। विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी परेशानी वाले लोगों के लिए लगातार धूल एवं कचरे का संपर्क चिंता का विषय हो सकता है।
स्वच्छ भारत का नारा तभी सार्थक होगा, जब औद्योगिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों से निकलने वाले कचरे के निपटारे की भी प्रभावी व्यवस्था हो।
छतों पर भूसे की परत—फिर भी जिम्मेदार विभाग मौन?
स्थानीय लोगों का कहना है कि मिलों से निकलने वाला भूसा आसपास फैल जाता है और घरों की छतों पर मोटी परत के रूप में जमा होता है। यदि यह शिकायत सही है तो प्रशासन को केवल जमीन के अतिक्रमण की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पर्यावरण, स्वच्छता, अग्नि सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं की भी जांच करनी चाहिए।
विशेषज्ञ स्तर पर निरीक्षण कर यह देखा जाना चाहिए कि मिल संचालन से धूल अथवा अन्य प्रदूषक निर्धारित मानकों का उल्लंघन तो नहीं कर रहे। साथ ही अग्नि सुरक्षा के इंतजाम भी जांचे जाने चाहिए, क्योंकि बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष या भूसा जमा होना आग के जोखिम को बढ़ा सकता है।
शासकीय जमीन की खरीद-फरोख्त का आरोप भी गंभीर
मामले में शासकीय भूमि की कथित खरीद-फरोख्त के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। यदि सरकारी भूमि को निजी संपत्ति की तरह बेचने या खरीदने के दस्तावेज सामने आते हैं तो यह अत्यंत गंभीर विषय होगा।
ऐसी स्थिति में केवल स्थानीय प्रशासन ही नहीं, बल्कि राजस्व विभाग को पुराने खसरा रिकॉर्ड, नामांतरण, रजिस्ट्री, अनुबंध, सीमांकन और कब्जे से जुड़े दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि सरकारी भूमि से संबंधित किसी दस्तावेज को निजी लेनदेन में इस्तेमाल किया गया या नहीं।
क्या प्रशासन को किसी बड़ी घटना का इंतजार है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जनप्रतिनिधि द्वारा अधिकारियों को अवगत कराया जा रहा है और स्थानीय नागरिक भी समस्या उठा रहे हैं, तो फिर निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही?
क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है?
यदि मिलें आबादी वाले क्षेत्र में चल रही हैं तो उनकी वैधानिक अनुमति, अग्नि सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण, भवन अनुमति, विद्युत सुरक्षा और भूमि उपयोग की जांच होना आवश्यक है। यदि सभी दस्तावेज नियमों के अनुरूप हैं तो प्रशासन को जांच के बाद सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि नियमों का उल्लंघन मिलता है तो दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
सांठगांठ’ के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी,।
स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के बीच कथित सांठगांठ के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन लगातार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर ‘आखिर संरक्षण किसका?’ जैसे सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसलिए जिला प्रशासन को मामले में निष्पक्ष टीम बनाकर जांच करानी चाहिए। जांच में राजस्व, नगर परिषद, प्रदूषण नियंत्रण, स्वास्थ्य और अग्निशमन से जुड़े अधिकारियों को शामिल किया जा सकता है।
जनता मांग रही है जवाब
नरवर की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि दस्तावेजों के आधार पर जवाब चाहती है—
शासकीय भूमि किसके नाम दर्ज है?
उस पर कब्जा किसका है?
मिल संचालन की अनुमति किसने दी?
भवन निर्माण की स्वीकृति है या नहीं?
भूमि उपयोग परिवर्तन हुआ है या नहीं?
प्रदूषण एवं अग्नि सुरक्षा के मानकों का पालन हो रहा है या नहीं?
शिकायतों के बाद अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की?
और यदि अतिक्रमण साबित होता है तो उसे हटाने में देरी क्यों?
अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है। यदि आरोप निराधार हैं तो प्रशासन दस्तावेज सामने रखकर स्थिति साफ करे। यदि आरोप सही हैं तो शासकीय भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराकर संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
सरकारी जमीन किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। उस पर कब्जे का मामला चाहे गरीब का हो या प्रभावशाली व्यक्ति का—कानून एक समान होना चाहिए। नरवर में भी जनता यही देखना चाहती है कि प्रशासन वास्तव में निष्पक्ष है या फिर कार्रवाई केवल कमजोर लोगों तक सीमित है।
