कुमार तीवल ! सम्राट अशोक और कालुवाकी के पुत्र साँची में सम्राट अशोक की रानी महादेवी के लिए विशाल स्तूप और महाविहार निर्माण का उल्लेख कई इतिहासकारों ने किया है । महादेवी से उत्पन्न पुत्र उजेनी, महिंद तथा पुत्री संघमित्रा का उल्लेख भी कई स्थानों पर मिलता है । महादेवी ने अपनी दोनों जीवित संतानों महिंदो और संघमित्ता को धम्म प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा । सम्राट अशोक की रानी कालुवाकी से कुमार तीवल पुत्र उत्पन्न हुए । तीवल और कालुवाकी का उल्लेख सम्राट अशोक के द्वितीय क्वीन शिलालेख में उत्कीर्ण है । सिरपुर में महानदी के किनारे सम्राट अशोक के पुत्र कुमार तीवल का विशाल महाविहार के अवशेष मौजूद हैं । तीवल का नाम तीवर या तिवार भी मिलता है । उसी प्रकार कालुवाकी का नाम कुरुवाकी भी मिलता है । ल और र आपस में क्षेत्रीय भाषा प्रभाव से रिप्लेस होते रहते हैं । सम्राट अशोक ने अपने आप को देवानंपिय कहा । अर्थात देवों के प्रिय ! दूसरे शब्दों में कहें तो राजाओं के प्रिय । तीवर ने भी अपने नाम ke साथ तीवर देव लिखा । महाविहार का नाम पढ़ा तीवर देव महाविहार ! उसी प्रकार सम्राट अशोक की रानी कालुवाकी के पुत्र तीवल ने महानदी के किनारे सिरपुर छत्तीसगढ़ में विशाल महाविहार और स्तूपों का निर्माण करवाया था । जैसे साँची महादेवी के लिए जाना जाता है उसी प्रकार का महत्व सिरपुर का है और सिरपुर की पहचान कालुवाकी और उनके पुत्र तीवल के लिए जाना जाता था । महिंद और तीवल दोनों ही कुमार ; बुद्ध धम्म के संरक्षक और प्रचारक रहे हैं । सिरपुर, साँची से ज़्यादा फैलाव वाला क्षेत्र रहा है । लेकिन महिन्द और संघमित्ता का श्रीलंका में धम्म प्रचार के लिए प्रस्थान करने से महादेवी की साँची का नाम अधिक सम्मान के साथ दर्ज हो गया । जबकि सिरपुर का महाविहार और साँची का सिरिमहाविहार दोनों बहुत महत्वपूर्ण स्थल रहे और दोनों सीधे सीधे मौर्य राजघराने के व्यक्तिगत संरक्षण में रहे । सिरपुर में महानदी के किनारे -किनारे लगभग 10 किलोमीटर क्षेत्र में स्तूप और महाविहार के अवशेष मिलते हैं । परिसर और संरचना के आकार से यह ज्ञात होता है जो बड़े महाविहार है वह सीधे सीधे राज्य के संरक्षण में थे क्योंकि बड़े महाविहारों का खर्चा उठाने राज्य द्वारा वित्त पोषण की आवश्यकता होती थी और राज्य महाविहार के आसपास के ग्रामों का राजस्व सीधे तौर पर इन महाविहारों के पास जाता था । साँची का सिरिमहाविहार हो या सिरपुर का तिवर महाविहार हो दोनों मौर्य राजवंश के सदस्यों के सीधे सीधे संरक्षण में फले फूले । सकड़ों छोटे छोटे महाविहार सीधे सीधे आम जनता स्व संचालित करती थी अर्थात् महाविहारों का खर्च उठाती थी । साँची के आसपास सतधारा, सोनारी, मुरेलखुर्द, अंधेर, उदयगिरि,भेलसा, रोहणी पदी, बेसनगर कई स्तूप संरचनाये है इसी प्रकार सिरपुर तिवार महाविहार के आसपास के क्षेत्र में कई स्तूप और महाविहार फैले हुए थे । साँची के स्तूप पहाड़ी पर होने से अधिक सुरक्षित बने रहे वही तीवर के महाविहार महानदी के समतल मैदान में और अंतर्राज्यीय बंदरगाह के बिल्कुल निकट होने से नष्ट होने का बाहरी ख़तरा अधिक था इसलिए साँची के मुक़ाबले अधिक खंडित अवस्था में मिले । दूसरा कारण महानदी की विशाल जलराशि और बाढ़ ने अधिक नुक़सान पहुँचाया । इसलिए सिरपुर की बौद्ध विरासत ज़मीन में दफ़न हो गई । विशाल अंतर्राजीय महा बाज़ार भी एक कारण रहा होगा । वर्तमान में जो निर्माण मिलते है वह तीसरी सदी ईसापूर्व से नौवीं ईसवी तक के हैं । भविष्य में इस क्षेत्र में खुदाई हुई तो सिर पुर की मौर्यकालीन वैभवता पुन: समय के भाल पर उत्कीर्ण की

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कुमार तीवल !

सम्राट अशोक और कालुवाकी के पुत्र

साँची में सम्राट अशोक की रानी महादेवी के लिए विशाल स्तूप और महाविहार निर्माण का उल्लेख कई इतिहासकारों ने किया है ।

महादेवी से उत्पन्न पुत्र उजेनी, महिंद तथा पुत्री संघमित्रा का उल्लेख भी कई स्थानों पर मिलता है । महादेवी ने अपनी दोनों जीवित संतानों महिंदो और संघमित्ता को धम्म प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा ।

सम्राट अशोक की रानी कालुवाकी से कुमार तीवल पुत्र उत्पन्न हुए ।

तीवल और कालुवाकी का उल्लेख सम्राट अशोक के द्वितीय क्वीन शिलालेख में उत्कीर्ण है ।

सिरपुर में महानदी के किनारे सम्राट अशोक के पुत्र कुमार तीवल का विशाल महाविहार के अवशेष मौजूद हैं ।

तीवल का नाम तीवर या तिवार भी मिलता है । उसी प्रकार कालुवाकी का नाम कुरुवाकी भी मिलता है । ल और र आपस में क्षेत्रीय भाषा प्रभाव से रिप्लेस होते रहते हैं । सम्राट अशोक ने  अपने आप को  देवानंपिय कहा । अर्थात देवों के प्रिय ! दूसरे शब्दों में कहें तो राजाओं के प्रिय । तीवर ने भी अपने नाम  ke साथ तीवर देव लिखा । महाविहार का नाम पढ़ा तीवर देव महाविहार !

उसी प्रकार सम्राट अशोक की रानी कालुवाकी के पुत्र  तीवल ने महानदी के किनारे सिरपुर छत्तीसगढ़ में विशाल महाविहार और स्तूपों का निर्माण करवाया था ।

जैसे साँची महादेवी के लिए जाना जाता है उसी प्रकार का महत्व सिरपुर का है और सिरपुर की पहचान कालुवाकी और उनके पुत्र तीवल के लिए जाना जाता था ।

महिंद और तीवल दोनों ही कुमार ;

बुद्ध धम्म के संरक्षक और प्रचारक रहे हैं ।


सिरपुर, साँची से ज़्यादा फैलाव वाला क्षेत्र रहा है । लेकिन महिन्द और संघमित्ता का श्रीलंका में धम्म प्रचार के लिए प्रस्थान करने से महादेवी की साँची का नाम अधिक सम्मान के साथ दर्ज हो गया ।


जबकि सिरपुर का महाविहार और साँची का सिरिमहाविहार दोनों बहुत महत्वपूर्ण स्थल रहे और दोनों सीधे सीधे मौर्य राजघराने के व्यक्तिगत संरक्षण में रहे ।


सिरपुर में महानदी के किनारे -किनारे लगभग 10 किलोमीटर क्षेत्र में स्तूप और महाविहार के अवशेष मिलते हैं । 


परिसर और संरचना के आकार से यह ज्ञात होता है जो बड़े महाविहार है वह सीधे सीधे राज्य के संरक्षण में थे क्योंकि बड़े महाविहारों का खर्चा उठाने राज्य द्वारा वित्त पोषण की आवश्यकता होती थी और राज्य महाविहार के आसपास के ग्रामों का राजस्व सीधे तौर पर इन महाविहारों के पास जाता था ।


साँची का सिरिमहाविहार हो या सिरपुर का तिवर महाविहार हो दोनों मौर्य राजवंश के सदस्यों के सीधे सीधे संरक्षण में फले फूले ।


सकड़ों छोटे छोटे महाविहार सीधे सीधे आम जनता स्व संचालित करती थी अर्थात् महाविहारों का खर्च उठाती थी ।


साँची के आसपास सतधारा, सोनारी, मुरेलखुर्द, अंधेर, उदयगिरि,भेलसा, रोहणी पदी, बेसनगर कई स्तूप संरचनाये है इसी प्रकार  सिरपुर तिवार महाविहार के आसपास के क्षेत्र में कई स्तूप और महाविहार फैले हुए थे ।


साँची के स्तूप पहाड़ी पर होने से अधिक सुरक्षित बने रहे वही तीवर के महाविहार महानदी के समतल मैदान में और अंतर्राज्यीय बंदरगाह के बिल्कुल निकट होने से नष्ट होने का बाहरी ख़तरा अधिक था  इसलिए साँची के मुक़ाबले अधिक 

खंडित अवस्था में मिले । 

दूसरा कारण महानदी की विशाल जलराशि और बाढ़ ने अधिक नुक़सान पहुँचाया ।

इसलिए सिरपुर की बौद्ध विरासत ज़मीन में दफ़न हो गई ।

विशाल अंतर्राजीय महा बाज़ार भी एक कारण रहा होगा ।

वर्तमान में जो निर्माण मिलते है वह तीसरी सदी ईसापूर्व से नौवीं ईसवी तक के हैं ।

भविष्य में इस क्षेत्र में खुदाई हुई तो सिर पुर की मौर्यकालीन वैभवता पुन: समय के भाल पर उत्कीर्ण की

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