Jitendra jain jila shivpuri समाचार
जो लोग यूजीसी के मुद्दे पर मौन है कल उनके बच्चे उनसे पूछेंगे
उन्हीं लोगों को समर्पित एक कविता
तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
जब सबको शिकायत का हक था, पर सवर्ण हाथ मलता था,
जब कानून की नजर में मेरा, हर अधिकार जलता था।
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
जब झूठी शिकायत करने पर भी, कोई सजा न होती थी,
जब मेरी बेगुनाही रातों को, काल कोठरी में रोती थी।
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
जब जांच कमेटी में अपना, कोई एक भी इंसान न था,
जब सवर्ण के पक्ष में बोलने वाला, कोई भी विद्वान न था।
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
जब मैं मेहनत से पढ़ता था और, आगे बढ़ता जाता था,
जब जलने वाला साथी मुझ पर, झूठे केस लगाता था।
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
जब मैं सुंदर थी, पढ़ने में अच्छी, और कॉलेज जाती थी,
जब 'जातिगत केस' की धमकी मुझे, सरेराह सताती थी।
जब ब्लैकमेलिंग के जाल में फँसकर, मेरी अस्मत लुटती थी,
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
जब प्रोफेसर के नंबर कम देने पर, झूठा शोर मचता था,
जब निर्दोष शिक्षक केस की, आग में हर दिन पचता था।
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
जब योग्यता का गला घोंटकर, हम सबको पीछे धकेला था,
जब सवर्ण समाज राजनीति के, गंदे चौक पर अकेला था।
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"
सुन लो सवर्णों! अगर आज भी, तुम दरी बिछाते जाओगे,
तो याद रहे तुम अपनी ही, नस्लों के हत्यारे कहलाओगे।
कल पूछेगा तुम्हारा खून— "जब खंजर सीने में उतरता था,"
"तब बाप मेरा क्या करता था? क्या सत्ता की भक्ति में मरता था?"