550 सांसदों की मौजूदगी में राज्यसभा में एक अहम और खतरनाक मुद्दे पर आवाज़ उठी—और वह आवाज़ थी सिर्फ़ एक।



 Jitendra jain jila shivpuri  समाचार 

550 सांसदों की मौजूदगी में राज्यसभा में एक अहम और खतरनाक मुद्दे पर आवाज़ उठी और वह आवाज़ थी सिर्फ़ एक।

राज्यसभा में राघव चड्ढा ने उस विषय को उठाया जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, 

जबकि वह हर घर, हर परिवार और हर इंसान की सेहत से जुड़ा है। सवाल था रोज़मर्रा के खाने का। दूध, मसाले, तेल और अन्य खाद्य पदार्थ—क्या ये पोषण दे रहे हैं या धीरे-धीरे ज़हर बनते जा रहे हैं?

यह कोई राजनीतिक बहस नहीं थी। यह सत्ता या विपक्ष का मुद्दा नहीं था। यह सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य, बच्चों के भविष्य और परिवारों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल था। खाद्य मिलावट और खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों का असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन लंबे समय में यही चीज़ें गंभीर बीमारियों और स्वास्थ्य संकट का कारण बनती हैं।

इस पूरे मुद्दे में सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि बाकी सांसदों की चुप्पी बेहद गहरी थी। जब एक आवाज़ चेतावनी दे रही थी, तब सैकड़ों प्रतिनिधि मौन रहे। यह खामोशी किसी बयान से कम नहीं थी।

खाद्य सुरक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक बुनियादी अधिकार है। अगर आज इस पर सवाल नहीं उठाए गए, तो इसकी कीमत कल आम नागरिक को अपनी सेहत से चुकानी पड़ेगी। राघव चड्ढा की यह पहल याद दिलाती है कि संसद का असली उद्देश्य जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को सामने लाना है—भले ही उस समय आवाज़ उठाने वाला कोई एक ही क्यों न हो।

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