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मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:बंगाल का चुनाव ममता की सबसे कठिन परीक्षा होगा Breaking News Update
बंगाल में चुनाव से पहले ममता बनर्जी के सामने पांच चुनौतियां हैं।
पहली, 15 साल की सत्ता विरोधी लहर से पार पाना।
दूसरी, संदेशखाली और शिक्षक भर्ती घोटाले में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से निपटना।
तीसरी, तृणमूल कार्यकर्ताओं के खिलाफ दुष्कर्म के मामलों के चलते वोटरों का खोया भरोसा वापस पाना।
चौथी, एसआईआर के बाद वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने को लेकर निर्वाचन आयोग से टकराना।
लेकिन पांचवीं चुनौती उन्हें सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।
यह है मुस्लिम वोटरों का तृणमूल से छिटककर ओवैसी की एआईएमआईएम और टीएमसी के बागी नेताओं के पाले में जाना।
तृणमूल के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर का कहना है कि वे मुस्लिम वोटबैंक को तोड़ने की योजना बना रहे हैं।
ऐसे में ममता ने जन-भावनाओं को लामबंद करने के लिए मनरेगा का नाम बदलने संबंधी कानून को औजार बनाया है।
एक कार्यक्रम में ममता ने कहा कि ‘मुझे शर्म महसूस हो रही है।
एक विधेयक लाया गया है।
गांधीजी के नाम पर बनी मनरेगा में अब उन्हीं का नाम नहीं होगा।
हम राष्ट्रपिता को भूल रहे हैं।
मैं इस देश की हूं तो इसके लिए मैं अपने सिवाय किसी को दोष भी नहीं दे सकती।
हमने ‘कर्मश्री’ योजना शुरू की थी, इसका नामकरण अब गांधीजी के नाम पर किया जाएगा।
’ लेकिन मनरेगा का नाम बदलने की बहस जल्द ही साम्प्रदायिक रंग में रंग गई।
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमिक भट्टाचार्य ने कहा- ‘यह विधेयक महात्मा गांधी के सम्मान के लिए ही लाया गया है, क्योंकि वे मानते थे कि राम ही भारत है और भारत ही राम हैं।
तृणमूल तो ‘जयश्री राम’ के नारे को भी अनुचित मानती है।
कुछ लोग राम के बजाय बाबर के रास्ते पर चलना चाहते हैं।
’ लेकिन इस सियासी तू-तू-मैं-मैं ने ‘वीबी-जी राम जी’ कानून के असल असर को दबा दिया।
इस कानून का बड़ा फायदा है कि भुगतान वाले कार्य दिवस 100 से बढ़ाकर 125 कर दिए गए हैं।
लेकिन एक कमी भी है कि योजना के खर्च का 40% बोझ राज्यों पर डाल दिया गया है।
हालांकि, हिमालयी और पूर्वोत्तर के राज्यों को 10% ही हिस्सेदारी देनी होगी।
मनरेगा अब तक शत-प्रतिशत केंद्र से वित्तपोषित रही है।
आर्थिक तंगी से जूझ रहे राज्यों पर लगभग आधा खर्च डालने से मजदूरी के भुगतान में देरी होगी तो गरीब मजदूरों को ही नुकसान पहुंचेगा।
केंद्र का दावा है कि पहले मनरेगा के तहत राज्यों को दिए गए पैसे में घोटाले हुए थे।
केंद्र-राज्य हिस्सेदारी तय करने से योजना अधिक पारदर्शी बनेगी।
हालांकि भाजपा और सहयोगी दलों के शासन वाले कई राज्यों ने ही इस पर नाखुशी जाहिर कर दी है।
एनडीए की सहयोगी टीडीपी शासित आंध्र प्रदेश ने साफ कर दिया है कि अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना उसके लिए मुश्किल होगा।
‘लाडकी बहिन योजना’ के कारण पहले से वित्तीय दबाव झेल रहा महाराष्ट्र भी इससे खासा प्रभावित होगा।
‘वीबी-जी राम जी’ योजना के तहत 2026 में राज्य में अनुमानित 1.51 लाख करोड़ के खर्च में से महाराष्ट्र को करीब 6 हजार करोड़ अतिरिक्त देने होंगे।
तो वापस आते हैं कि क्या मनरेगा विवाद ममता बनर्जी को खोई चुनावी साख वापस दिला सकता है? शायद नहीं।
लेकिन यह प्रचार के दौरान ममता सरकार पर लगे घोटालों के दागों से ध्यान भटकाने में मददगार जरूर बन सकता है।
ममता जल्द ही 71 साल की हो जाएंगी।
उनके उत्तराधिकारी और भतीजे अभिषेक बनर्जी टीएमसी के कार्यकर्ताओं में उतने लोकप्रिय नहीं हैं।
वे रूखे मिजाज वाले हैं और अपमानजनक व्यवहार भी कर सकते हैं।
2024 में ममता बनर्जी ने कुछ वक्त के लिए उनसे दूरी भी बना ली थी, लेकिन कई घोटाले सामने आने पर उनकी वापसी कराई गई है।
इधर, पड़ोसी बांग्लादेश की उथल-पुथल इस चुनाव में दोधारी तलवार जैसी हो सकती है।
एसआईआर के चलते तृणमूल के वोटर समझे जाने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या घटी है।
लेकिन ढाका में बढ़ता साम्प्रदायिक तनाव पश्चिम बंगाल के मुस्लिम वोटरों को ममता के पक्ष में लामबंद कर सकता है।
क्योंकि वे जानते हैं कि ओवैसी और हुमायूं कबीर टीएमसी वोटरों का छोटा-सा हिस्सा ही तोड़ सकते हैं।
ऐसे में ममता ही भाजपा से उनका बचाव कर सकती हैं।
लेकिन यदि बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार रोकने में नाकाम रहती है तो बंगाल चुनाव पर इसका गम्भीर असर हो सकता है।
इससे अब तक पसोपेश में फंसे हिंदू वोटर भाजपा का दामन थाम सकते हैं।
मुस्लिम वोटरों का तृणमूल से छिटककर ओवैसी और टीएमसी के बागी नेताओं के पाले में जाना ममता को चिंतित कर रहा है।
टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर का कहना है वे मुस्लिम वोटबैंक तोड़ने की योजना बना रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)।
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Posted on 05 January 2026 | Keep reading चाचा का धमाका.com for news updates.