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धर्म और माया के बीच नारद का संघर्ष: विश्वमोहिनी स्वयंवर में अमरत्व की चाह Narada Muni Attachment Immortality
चाचा का धमाका की रिपोर्ट के अनुसार, एक ऐसे प्रसंग का उल्लेख मिलता है जहां नारद मुनि जैसे परम विरक्त भी मोह और अमरता के जाल में फंस गए।
उनके हृदयांगण में सदैव विरक्ति और आध्यात्मिक प्रकाश व्याप्त रहता था, परंतु विश्वमोहिनी की भाग्यरेखा का अवलोकन करते ही उनके भीतर कामना और लोभ की प्रबल जकड़न जाग उठी।
जो मुनि संसार को नश्वरता का उपदेश देते थे और धर्म के मार्ग पर चलने का आह्वान करते थे, वही अमरत्व के मोहपाश में बंधने लगे।
विश्वमोहिनी के स्वयंवर की यह शर्त थी कि जो उन्हें वरण करेगा, वह अजर-अमर हो जाएगा, रणभूमि में उसे कोई पराजित नहीं कर पाएगा, और समस्त चर-अचर प्राणी उसकी सेवा करेंगे।
यह सुनकर नारद मुनि के नेत्रों में आश्चर्य था, पर उन्होंने अपने मन की तीव्र तरंगों को बाहर प्रकट नहीं होने दिया।
उन्हें भय था कि यदि विश्वमोहिनी के इन अद्भुत लक्षणों का ज्ञान संसार में फैल गया, तो अनेक अयोग्य प्रतियोगी भी स्वयंवर में आ पहुंचेंगे, जिससे उनका मार्ग कठिन हो सकता है।
नारद मुनि की इच्छा थी कि प्रतियोगियों की संख्या जितनी कम हो, उतना ही अच्छा।
उनके मन में बस एक ही दृढ़ भाव था— किसी भी प्रकार कन्या को प्राप्त करना है।
वे सोचने लगे कि मैं तो जप-तप का धनी हूँ, जटाधारी हूँ और देवताओं को भी प्रिय हूँ।
मेरा आध्यात्मिक बल अतुलनीय है।
मुझे इस शुभ कार्य के लिए किसी से सहायता मांगने की क्या आवश्यकता? मैं अपनी ही तपस्या, जप और पूजा के बल पर विश्वमोहिनी को प्राप्त कर लूंगा।
यह प्रसंग हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा देता है कि कितना भी बड़ा तपस्वी क्यों न हो, मोह-माया के सूक्ष्म जाल से बच पाना अत्यंत कठिन होता है, और यह आध्यात्मिक यात्रा का एक अटूट हिस्सा है।
- नारद मुनि का अमरता और विश्वमोहिनी के प्रति मोह में फंसना।
- स्वयंवर में कम प्रतियोगियों की चाहत और तप बल पर भरोसा।
- मोह-माया के जाल से बड़े-बड़े तपस्वियों का भी न बच पाना।
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Posted on 05 December 2025 | Stay updated with चाचा का धमाका.com for more news.