मनोज जोशी का कॉलम:दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच बदल रहे हैं समीकरण Breaking News Update

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मनोज जोशी का कॉलम:दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच बदल रहे हैं समीकरण Breaking News Update

अमेरिका-चीन संबंध अब एक बिल्कुल अलग स्तर पर पहुंच चुके हैं।

यह अतीत की किसी आपसी समझ की वापसी नहीं है, बल्कि प्रतिस्पर्धा और सहभागिता से परिभाषित एक नया चरण है, जिसकी सबसे प्रमुख विशेषता लेन-देन पर आधारित व्यवहार है।

ट्रम्प के नेतृत्व में आए उ​तार-चढ़ावों से निपटने में चीन असाधारण रूप से सफल रहा है।

उसने ट्रम्प के तुष्टीकरण के बजाय शांत लेकिन दृढ़ तरीके से अमेरिका का सामना करना चुना और ऐसी ट्रेड-डील हासिल की, जो उसके हितों के अनुरूप है।

यही कारण है कि इसी महीने जारी नई अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में चीन को आर्थिक प्रतिस्पर्धी, लगभग समकक्ष शक्ति और ऐसा देश बताया गया है, जिसे अमेरिका और उसके सहयोगियों के तकनीकी व आर्थिक इको-सिस्टम से बाहर रखने की रणनीति जरूरी मानी गई है।

इस पूरे साल दोनों देश टैरिफ को लेकर लंबी खींचतान में उलझे रहे।

इस दौरान चीन ने अमेरिका द्वारा लगाए गए बेहद कठोर टैरिफों का डटकर सामना किया, जो एक समय 140% तक पहुंच गए थे।

सितंबर में अमेरिका ने दबाव और बढ़ाने की कोशिश करते हुए उन चीनी कंपनियों की सूची का विस्तार कर दिया, जिन्हें अमेरिका से निर्यात के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य था।

इसके जवाब में चीन ने अपना ‘ब्रह्मास्त्र’ इस्तेमाल किया- रेयर अर्थ्स से बने उत्पादों के वैश्विक इस्तेमाल पर प्रतिबंध।

इनमें कारों के पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल और ऐसे कई अन्य उत्पाद शामिल हैं।

30 अक्टूबर को हुए बुसान व्यापार समझौते के जरिए दोनों पक्षों ने एक कदम पीछे हटने का फैसला किया।

चीनी और अमेरिकी रुख के बीच बुनियादी फर्क यह रहा कि बीजिंग ट्रम्प के पहले कार्यकाल से ही इस टकराव की तैयारी कर रहा था।

चीन अब भी उन्नत सेमीकंडक्टर्स, एयरोस्पेस उपकरण और तकनीक, उच्चस्तरीय मशीनरी व प्रिसीजन इंस्ट्रूमेंट्स तथा कुछ जैव-चिकित्सकीय और फार्मा उत्पादों के लिए रणनीतिक रूप से पश्चिम पर निर्भर है।

इसके बावजूद, पश्चिम चीन पर कई अहम उत्पादों के लिए निर्भर बना हुआ है- इलेक्ट्रॉनिक सामान और उसके घटक, इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरियां, दवाओं के कच्चे रसायन और सबसे महत्वपूर्ण, रेयर अर्थ्स और मैग्नेट।

हकीकत यह है कि पिछले 20 वर्षों में ईयू और अमेरिका की उन वस्तुओं पर निर्भरता काफी बढ़ी है, जिन्हें वे मुख्य रूप से चीन से मंगाते हैं; जबकि चीन ने अमेरिका और ईयू के उत्पादों पर अपनी निर्भरता घटा दी है।

2022 में अमेरिका 5,000 से कुछ अधिक उत्पाद श्रेणियों में से 532 में चीन से आयात पर भारी रूप से निर्भर था, जो 2000 की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है।

जबकि इसी अवधि में चीन ने उन उत्पादों की संख्या लगभग आधी कर दी, जिनके लिए वह अमेरिका पर निर्भर था- 116 से घटकर 57।

अमेरिका के पास आज के चीन को एक राजनीतिक और आर्थिक समकक्ष- एक औद्योगिक महाशक्ति- के रूप में देखने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

बेशक चीन की अपनी कमजोरियां हैं : जनसांख्यिकीय चुनौतियां और एक अव्यवस्थित राजकोषीय स्थिति, जिसने उसकी आर्थिक गति को प्रभावित किया है।

चीनी नेतृत्व संभवतः भीतर की ओर अधिक ध्यान दे रहा है और वैश्विक साम्राज्यवादी वर्चस्व के बजाय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सर्वोच्चता बनाए रखने पर केंद्रित है।

ताइवान पर कब्जे के लिए चीन के सैन्य विकल्प अपनाने की चर्चा भले ही जोर-शोर से होती रहे, लेकिन ऐसी स्थिति के घटित होने की संभावना कम है।

बीजिंग का उद्देश्य ताइवान की सम्प्रभुता संबंधी बयानबाजी पर लगाम लगाना और री-यूनिफिकेशन के सवाल को फिलहाल आगे के लिए टालते रहना है।

फिलहाल तो अमेरिका ताइवान के सवाल पर रणनीतिक अस्पष्टता बनाए हुए है कि सैन्य संघर्ष की स्थिति में अमेरिकी सैनिक ताइवान की रक्षा करेंगे या नहीं।

बदले रिश्तों का संकेत 2026 में देखने को मिलेगा, जब ट्रम्प और शी के बीच चार बैठकें होने की संभावना है।

इनमें दोनों की एक-दूसरे के देशों में राजकीय यात्राएं, फ्लोरिडा में प्रस्तावित जी-20 समिट के दौरान बातचीत और शेनझेन में होने वाले एपीईसी शिखर सम्मेलन के इतर एक और बैठक शामिल हो सकती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)।

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Posted on 16 December 2025 | Follow चाचा का धमाका.com for the latest updates.

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