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वंदे मातरम्: भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उद्घोष क्या है? Breaking News Update
चाचा का धमाका की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के इतिहास में गीतों और कलाओं ने लोकभावनाओं को सहेजकर विभिन्न आंदोलनों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और इसी कड़ी में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ एक मील का पत्थर साबित हुआ है।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित यह स्तोत्र, सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की पहली उद्घोषणा माना जाता है।
यह भारत की पहचान को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक भू-सांस्कृतिक राष्ट्र के तौर पर स्थापित करता है, जिसकी एकता उसकी सभ्यता और संस्कृति में निहित है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, यह गीत सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना, और आज भी इसकी गूँज भारतीय राजनीति में सुनाई देती है।
विभिन्न नेता और राजनीतिक दल इसे अपनी विचारधारा से जोड़ते रहे हैं।
यह गीत हमें स्वाभिमान और एकजुटता का संदेश देता है, जैसा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के युद्धगीतों या आपातकाल के विरुद्ध युवाओं के नारों में देखा गया।
'वंदे मातरम्' ने भारतीय समाज को राष्ट्रीयता के एक नए आयाम से परिचित कराया, जहां देशप्रेम केवल भूमि से नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा है।
आगामी चुनावों में भी अक्सर राष्ट्रवाद के इस पहलू पर बीजेपी और कांग्रेस जैसी प्रमुख पार्टियों के बीच बहस देखने को मिलती है, जो इसके स्थायी महत्व को दर्शाता है।
इस तरह, 'वंदे मातरम्' केवल एक राष्ट्रीय गीत न होकर, भारतीय पहचान और राजनीतिक दर्शन का एक अभिन्न अंग बन गया है।
- वंदे मातरम् भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पहली उद्घोषणा है।
- बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में इस राष्ट्रीय गीत की रचना की।
- यह गीत भारतीय राजनीति में एकता और स्वाभिमान का प्रतीक है।
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Posted on 14 November 2025 | Follow चाचा का धमाका.com for the latest updates.