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क्या हमारी ‘राजनीति’ हरित दीपोत्सव को प्राथमिकता देगी? पर्यावरण और धर्म का संगम Deepotsav Environmental Crisis Politics
चाचा का धमाका की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सदियों से चली आ रही दीपोत्सव की गौरवशाली परंपरा अब पर्यावरण संकट के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे में बदल गई है, जहां बारूद की लपटें प्रकाश के बजाय धुएं का साम्राज्य स्थापित कर रही हैं।
यह सवाल अब राष्ट्रीय स्तर पर उठ रहा है कि क्या हमारी राजनीतिक इच्छाशक्ति इस पर्व को उसके आध्यात्मिक मूल स्वरूप में लौटाने में सक्षम होगी।
दीवाली, उजालों का त्योहार, खुशियों का स्वागत! लेकिन जब यही जश्न हमारी सांसों को घुटन से भर दे और हमारे वातावरण को जहर बना दे, तब सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हम सच में रोशनी फैला रहे हैं या अंधकार को और गहरा कर रहे हैं।
भारत में सदियों से दीयों की झिलमिलाती रोशनी और हल्की आतिशबाजी के साथ दीपोत्सव मनाने की परंपरा रही है।
यह पर्व अच्छाई की विजय, प्रकाश की महिमा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है परंतु पिछले कुछ दशकों में इसका स्वरूप इस कदर बदल गया है कि अब यह ‘आतिशबाजी का युद्ध’ प्रतीत होता है।
वह उत्सव, जो कभी शांति और प्रकाश की अनुभूति देता था, आज शोर, धुएं और प्रदूषण का प्रतीक बन चुका है।
बारूद से लबालब पटाखों की चमक पलभर में न केवल जान-माल का खतरा पैदा करती है बल्कि वायु, ध्वनि और मिट्टी तीनों को गहराई से प्रदूषित करती है।
इन पटाखों में बेरियम, सीसा, गंधक और कॉपर जैसे रासायनिक तत्व होते हैं, जो फूटने के बाद घंटों तक वातावरण में तैरते रहते हैं।
बेरियम रेडियोधर्मी और विषैला होता है, कॉपर कैंसर का खतरा बढ़ाता है और गंधक श्वसन तंत्र को नष्ट करता है।
सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे हानिकारक गैसें अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोगों को बढ़ावा देती हैं।
ऐसे में, आम जनता ही नहीं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक दल और नेता भी इस गंभीर समस्या पर चिंतन करने पर मजबूर हैं।
यह एक ऐसा मुद्दा बन गया है जो आगामी चुनावों में भी चर्चा का विषय बन सकता है।
जहां एक ओर बीजेपी सरकार ‘स्वच्छ भारत’ जैसे अभियानों पर जोर दे रही है, वहीं दीवाली जैसे बड़े पर्व पर प्रदूषण नियंत्रण की चुनौती भी उसके सामने खड़ी है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी इस पर अपनी राजनीति कर सकते हैं, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल सकता है।
हमें समझना होगा कि ‘हरित दीपोत्सव’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए।
इसे लागू करने के लिए केवल सरकारी आदेश काफी नहीं, बल्कि जनभागीदारी और सामाजिक चेतना का जागृत होना आवश्यक है।
हर नागरिक, हर नेता, हर राजनीतिक दल को इस दिशा में अपना योगदान देना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां एक स्वच्छ और स्वस्थ भारत में दीवाली का सच्चा आनंद ले सकें।
एक स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा, जहाँ प्रकाश अंधकार पर हावी होगा, न कि धुएं का गुबार।
- पटाखों से वायु, ध्वनि और मिट्टी प्रदूषित, स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा।
- रासायनिक तत्वों से कैंसर व श्वसन रोग का डर।
- हरित दीपोत्सव की मांग, राजनीतिक दलों के लिए चुनौती।
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Posted on 27 October 2025 | Visit चाचा का धमाका.com for more stories.